नई दिल्ली: अगर आपके घर में बच्चे का जन्म हुआ है और अभी तक उसका जन्म प्रमाण पत्र नहीं बनवाया गया है, या परिवार में किसी सदस्य की मृत्यु के बाद डेथ सर्टिफिकेट नहीं बन पाया है, तो यह खबर आपके लिए महत्वपूर्ण है। जन्म और मृत्यु के देर से होने वाले पंजीकरण की प्रक्रिया अब पहले की तुलना में अधिक सत्यापन आधारित होगी। Registration of Births and Deaths Act, 1969 में किए गए संशोधन के तहत देरी से पंजीकरण कराने के मामलों में अलग-अलग स्तर पर सक्षम अधिकारी की मंजूरी जरूरी होगी।
नए प्रावधान 1 अक्टूबर 2026 से लागू होने हैं। सरकार के अनुसार, इसका उद्देश्य जन्म और मृत्यु का समय पर पंजीकरण सुनिश्चित करना और देरी से किए जाने वाले पंजीकरण में गलत जानकारी या संभावित फर्जीवाड़े की आशंका को कम करना है।
संसद से मंजूरी के बाद बदली व्यवस्था
जन्म एवं मृत्यु पंजीकरण से जुड़े बदलावों के लिए Registration of Births and Deaths (Amendment) Bill, 2026 संसद के मानसून सत्र में पेश किया गया था। लोकसभा ने इसे 31 जुलाई और राज्यसभा ने 4 अगस्त 2026 को मंजूरी दी। इसके बाद राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने पर यह कानून बन गया।
संशोधन में खास तौर पर उन मामलों की प्रक्रिया को स्पष्ट किया गया है, जिनमें जन्म या मृत्यु की जानकारी निर्धारित समय के काफी बाद रजिस्ट्रार को दी जाती है।
1 से 2 साल की देरी पर किसकी मंजूरी जरूरी?
अगर जन्म या मृत्यु के पंजीकरण में एक साल से अधिक लेकिन दो साल तक की देरी हो गई है, तो ऐसे मामलों में जिला मजिस्ट्रेट (DM), अनुमंडल मजिस्ट्रेट (SDM) या DM द्वारा अधिकृत Executive Magistrate का आदेश जरूरी होगा।
संबंधित अधिकारी उपलब्ध जानकारी और दस्तावेजों के आधार पर जन्म या मृत्यु की वास्तविकता का सत्यापन करने के बाद पंजीकरण की अनुमति दे सकेंगे। इसके लिए निर्धारित शुल्क का भुगतान भी करना होगा।
यानी अगर बच्चे के जन्म को एक साल से ज्यादा हो चुका है और अब जन्म प्रमाण पत्र बनवाना है, तो सामान्य पंजीकरण प्रक्रिया के बजाय अतिरिक्त सत्यापन और सक्षम अधिकारी की मंजूरी की जरूरत पड़ सकती है।
2 साल से ज्यादा पुराना मामला तो मजिस्ट्रेट का आदेश
दो साल से अधिक पुराने जन्म या मृत्यु के मामलों में प्रक्रिया और अधिक औपचारिक होगी। ऐसे मामलों में पंजीकरण के लिए Judicial Magistrate First Class (प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट) का आदेश जरूरी होगा।
मजिस्ट्रेट उपलब्ध तथ्यों और दस्तावेजों के आधार पर घटना की वास्तविकता की जांच के बाद पंजीकरण का आदेश दे सकेंगे। यहां भी निर्धारित शुल्क का भुगतान करना होगा।
इस तरह देरी की अवधि बढ़ने के साथ पंजीकरण की जांच और मंजूरी का स्तर भी बदल जाएगा।
पहले क्या था, अब क्या बदलेगा?
संशोधन से पहले एक साल से अधिक देरी वाले जन्म या मृत्यु पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के आदेश की व्यवस्था थी।
नए प्रावधानों में:
- एक साल तक: निर्धारित सामान्य प्रक्रिया के तहत पंजीकरण।
- एक साल से अधिक और दो साल तक: DM, SDM या अधिकृत Executive Magistrate के आदेश की आवश्यकता।
- दो साल से अधिक: Judicial Magistrate First Class के आदेश की आवश्यकता।
इस बदलाव के जरिए देरी से होने वाले पंजीकरण को अलग-अलग स्तरों पर सत्यापन की व्यवस्था से जोड़ा गया है।
सरकार ने क्यों किया बदलाव?
सरकार का कहना है कि जन्म और मृत्यु का समय पर पंजीकरण जरूरी है। लंबे समय बाद पंजीकरण कराने की स्थिति में रिकॉर्ड की सत्यता की जांच करना महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी को ध्यान में रखते हुए देरी वाले मामलों में सत्यापन और सक्षम अधिकारी की मंजूरी की व्यवस्था की गई है।
जन्म प्रमाण पत्र व्यक्ति की जन्मतिथि और उम्र से जुड़े कई सरकारी कार्यों में महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है। वहीं डेथ सर्टिफिकेट का इस्तेमाल संपत्ति के हस्तांतरण, उत्तराधिकार, पेंशन, बीमा और दूसरी कानूनी प्रक्रियाओं में किया जाता है।
अभी क्या करना चाहिए?
अगर आपके परिवार में बच्चे का जन्म हुआ है और अभी तक उसका जन्म प्रमाण पत्र नहीं बना है, तो पंजीकरण को अनावश्यक रूप से टालने से बचें। इसी तरह किसी सदस्य की मृत्यु के बाद डेथ सर्टिफिकेट नहीं बना है, तो संबंधित रजिस्ट्रार कार्यालय में जल्द प्रक्रिया पूरी कराना उचित रहेगा।
1 अक्टूबर 2026 से नए प्रावधान लागू होने के बाद देरी वाले मामलों में अतिरिक्त सत्यापन और सक्षम अधिकारी की मंजूरी की जरूरत होगी। इसलिए जन्म और मृत्यु का समय पर पंजीकरण कराने से आगे की सरकारी और कानूनी प्रक्रियाओं में अनावश्यक जटिलता से बचा जा सकता है।







