पटना/बेगूसराय: बिहार के पानी और फरक्का जल संधि के मुद्दे पर जनता दल (यू) ने अपना रुख और ज्यादा आक्रामक कर दिया है। फरक्का जल संधि को लेकर जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय कुमार झा ने स्पष्ट कहा है कि बिहार के हितों से किसी भी कीमत पर समझौता स्वीकार नहीं किया जाएगा। वहीं, ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने भी सरकार से इस मुद्दे पर गंभीरता से संज्ञान लेने की मांग की है। दोनों नेताओं के बयानों के बाद फरक्का जल संधि को लेकर बिहार की सियासत एक बार फिर गरमा गई है।
फरक्का जल संधि के नवीनीकरण का विरोध
कंकौल स्थित प्रेक्षागृह सभागार में मंगलवार को जेडीयू की ओर से ‘फरक्का जल संधि पर नीतिगत संवाद’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में संजय झा ने कहा कि वर्ष 1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच हुई फरक्का जल संधि बिहार के हित में नहीं है। उन्होंने कहा कि इस संधि का नवीनीकरण नहीं होना चाहिए।
संजय झा ने कहा कि अगर भविष्य में इस संबंध में कोई समझौता होता है तो उसमें बिहार की वर्ष 2050 तक की जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखना जरूरी होगा। उन्होंने बिहार के जल अधिकारों को राज्य के भविष्य से जोड़ते हुए इस मुद्दे पर अभी से ठोस नीति बनाने की जरूरत बताई।
‘सरकार में रहें या नहीं, फर्क नहीं पड़ता’
फरक्का जल संधि को लेकर जेडीयू के रुख की खास बात यह रही कि संजय झा ने इसे सत्ता और राजनीतिक समीकरणों से ऊपर बिहार के हित का सवाल बताया। उन्होंने संकेत दिया कि बिहार के हित और अधिकार से जुड़े मुद्दों पर पार्टी किसी राजनीतिक समीकरण की परवाह नहीं करेगी।
संजय झा ने कहा कि फरक्का जल संधि के कारण बिहार का जल प्रबंधन प्रभावित हुआ है और राज्य को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने बिहार की भविष्य की जरूरतों को देखते हुए जल प्रबंधन को लेकर दीर्घकालिक नीति की आवश्यकता पर जोर दिया।
उन्होंने फरक्का बराज और उससे जुड़ी गाद की समस्या का भी उल्लेख किया। जेडीयू का कहना है कि फरक्का बराज के कारण गंगा में गाद जमा होने से नदी का तल ऊंचा हुआ है, जिसका असर बिहार में बाढ़ की स्थिति पर पड़ता है। वहीं, शुष्क मौसम में पानी की उपलब्धता को लेकर भी बिहार को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
संजय झा के बाद श्रवण कुमार का बड़ा बयान
संजय झा के बयान के बाद ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार ने भी फरक्का जल संधि के मुद्दे पर सरकार से संज्ञान लेने की मांग की। उन्होंने कहा कि जेडीयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष इस विषय को मजबूती से उठा रहे हैं और सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
श्रवण कुमार ने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लंबे समय से फरक्का और गाद नीति के मुद्दे को उठाते रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब नीतीश कुमार लोकसभा में थे, तब भी उन्होंने इस विषय को उठाया था और मुख्यमंत्री बनने के बाद भी बिहार के हित में फरक्का तथा गाद प्रबंधन का सवाल लगातार उठाते रहे हैं।
श्रवण कुमार के मुताबिक, समस्या केवल फरक्का जल संधि तक सीमित नहीं है, बल्कि गंगा में गाद प्रबंधन भी बिहार के लिए बड़ी चुनौती है। उनका कहना था कि जब पानी कम आता है तो बिहार को उसका अपेक्षित लाभ नहीं मिलता, जबकि ज्यादा पानी आने पर राज्य को बाढ़ और तबाही का सामना करना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि फरक्का जल संधि पर राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा जो बातें उठा रहे हैं, उन पर सरकार को गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए।
‘कम पानी में फायदा नहीं, ज्यादा पानी में नुकसान’
जेडीयू नेताओं के बयानों में बिहार के जल प्रबंधन को लेकर एक बड़ा सवाल सामने आया है। पार्टी का कहना है कि बिहार को पानी की दोनों स्थितियों में परेशानी झेलनी पड़ती है। मानसून के दौरान अधिक पानी आने पर बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है, जबकि गर्मी और शुष्क मौसम में पानी की उपलब्धता चुनौती बन जाती है।
जेडीयू का मानना है कि गंगा और उसकी सहायक नदियों में गाद की समस्या का स्थायी समाधान जरूरी है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट गाद नीति बनाए जाने की जरूरत है।
श्रवण कुमार ने कहा कि नीतीश कुमार लंबे समय से इस विषय पर यह स्पष्ट संदेश देते रहे हैं कि बिहार की भौगोलिक स्थिति और उसकी जल आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए गाद प्रबंधन की नीति तय होनी चाहिए।
2050 तक बिहार के पानी का हिसाब क्यों?
संजय झा ने फरक्का जल संधि के भविष्य को वर्ष 2050 की जरूरतों से जोड़कर इस मुद्दे को और व्यापक बना दिया है। उनका कहना है कि बिहार की आबादी, कृषि, उद्योग और शहरीकरण के साथ आने वाले वर्षों में पानी की मांग भी बढ़ेगी।
ऐसे में किसी भी अंतरराष्ट्रीय जल समझौते में बिहार की दीर्घकालिक जल जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। जेडीयू अब इस मुद्दे को बिहार के अधिकार और भविष्य की जल सुरक्षा से जोड़ रही है।
फरक्का पर JDU की रणनीति क्या है?
फरक्का जल संधि पर जेडीयू के लगातार दो प्रमुख नेताओं के बयान से संकेत मिल रहा है कि पार्टी इस मुद्दे को केवल तकनीकी या जल प्रबंधन का विषय नहीं रहने देना चाहती। इसे बिहार के अधिकार, बाढ़, सूखे और भविष्य की जल जरूरतों से जोड़कर बड़े राजनीतिक मुद्दे के तौर पर उठाया जा रहा है।
संजय झा का सख्त रुख और श्रवण कुमार की सरकार से संज्ञान लेने की मांग आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर बिहार की राजनीति को और गरमा सकती है। अब बड़ा सवाल यह है कि बिहार के हिस्से के पानी और वर्ष 2050 तक उसकी जल जरूरतों को लेकर केंद्र सरकार क्या कदम उठाती है







