पटना: बिहार में आरक्षण के मुद्दे पर NDA के घटक दलों के बीच बयानबाजी तेज हो गई है। अनुसूचित जातियों के भीतर ‘कोटे में कोटा’ और आरक्षण की समीक्षा को लेकर लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) प्रमुख एवं केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (सेक्युलर) के नेताओं के रुख में अंतर खुलकर सामने आया है।
चिराग पासवान ने SC-ST आरक्षण में क्रीमी लेयर या ऐसी किसी व्यवस्था का विरोध किया है, जिससे मौजूदा आरक्षण व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो। साथ ही उन्होंने कहा है कि सरकार की जिम्मेदारी अनुसूचित जाति-जनजाति समेत सभी सामाजिक समूहों की चिंताओं को दूर करने की है। LJP (रामविलास) ने अपने सोशल मीडिया संदेश में कहा— “हमारी सीट आरक्षित है, सोच नहीं।”
सभी वर्गों की बात कर रही LJP
चिराग के रुख के समर्थन में पार्टी ने खुद को SC-ST, पिछड़े और सामान्य वर्ग समेत सभी समुदायों के न्याय की बात करने वाला बताया है। पार्टी रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत का जिक्र करते हुए यह संदेश दे रही है कि सामाजिक न्याय किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं होना चाहिए।
HAM ने उठाया ‘कोटे में कोटा’ का मुद्दा
दूसरी ओर HAM के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं बिहार सरकार के मंत्री संतोष कुमार सुमन का कहना है कि ‘कोटे में कोटा’ और क्रीमी लेयर अलग-अलग विषय हैं। उनका तर्क है कि आरक्षण के लाभ की समीक्षा इसलिए होनी चाहिए ताकि यह पता लगाया जा सके कि सबसे वंचित दलित समुदायों तक इसका लाभ पर्याप्त रूप से पहुंच रहा है या नहीं।
HAM का दावा है कि उसकी मांग किसी का आरक्षण खत्म करने की नहीं, बल्कि सबसे कमजोर समूहों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की है।
संतोष सुमन ने आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग को आरक्षण दिए जाने की बहस में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की पुरानी पहल का भी उल्लेख किया है। हालांकि इससे जुड़े ऐतिहासिक दावों को संबंधित पक्ष के राजनीतिक दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
NDA में वैचारिक मतभेद या सियासी रणनीति?
फिलहाल दोनों दल NDA का हिस्सा हैं और विवाद आरक्षण नीति को लेकर राजनीतिक बयानबाजी के स्तर पर है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि इससे गठबंधन पर कोई औपचारिक असर पड़ेगा।
लेकिन ‘कोटे में कोटा’, SC आरक्षण में क्रीमी लेयर और गरीब सवर्णों के प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों ने बिहार में सामाजिक न्याय की राजनीति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।







