Monday, July 6, 2026
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वर्तमान समय की त्रासदी : बढ़ता सिजेरियन प्रसव और आम परिवारों पर बढ़ता आर्थिक बोझ

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नोएडा | संयोगिता सुमन की रिपोर्ट

मातृत्व को भारतीय समाज में हमेशा सबसे पवित्र और भावनात्मक अनुभव माना गया है। “माँ” केवल एक शब्द नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और सृजन का सबसे सुंदर स्वरूप है। लेकिन आधुनिक समय में मातृत्व सुख अब तेजी से बदलती चिकित्सा व्यवस्था, बढ़ते निजी अस्पतालों और महंगे इलाज के बोझ तले दबता दिखाई दे रहा है।

आज के दौर में सामान्य प्रसव की जगह सिजेरियन डिलीवरी का बढ़ता चलन समाज के कई वर्गों के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। खासकर मध्यमवर्गीय और सामान्य परिवारों में पहली बार माता-पिता बनने जा रहे दंपतियों के सामने प्रसव के दौरान होने वाले भारी खर्च का डर लगातार बढ़ रहा है।

युवा दंपति श्रेया सिंह का कहना है कि आज निजी अस्पतालों में प्रसव एक महंगे पैकेज की तरह बन चुका है। अस्पतालों द्वारा महंगाई, आधुनिक सुविधा और सुरक्षा का हवाला देकर परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ाया जा रहा है। कई बार लोगों को यह समझ ही नहीं आता कि सामान्य प्रसव संभव था या सिजेरियन वास्तव में जरूरी था।

“माँ” का भावनात्मक स्वरूप और बदलती चिकित्सा व्यवस्था

समाज में माँ को हमेशा ईश्वर का स्वरूप माना गया है। साहित्य और कविता में भी माँ को सबसे ऊंचा स्थान दिया गया है। लेकिन आज का चिकित्सा तंत्र मातृत्व को एक बड़े व्यवसाय के रूप में बदलता नजर आ रहा है।

रत्नावती नामक महिला, जो खुद सिजेरियन प्रसव की प्रक्रिया से गुजर चुकी हैं, बताती हैं कि आज के समय में बच्चे के जन्म से पहले ही परिवारों को लाखों रुपये के इंतजाम की चिंता सताने लगती है।

उनका कहना है कि “पहले बच्चे का जन्म परिवार के लिए उत्सव होता था, लेकिन अब अस्पताल का बिल और खर्च सबसे बड़ी चिंता बन चुका है।”

पहले दाई माँ, अब महंगे अस्पताल

वरिष्ठ महिला रमादेवी का कहना है कि पहले गांवों और कस्बों में दाई माँ के जरिए सामान्य प्रसव आम बात थी। प्रसव पीड़ा को जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया माना जाता था।

लेकिन अब आधुनिक जीवनशैली, सुविधा और दर्द रहित डिलीवरी की चाहत ने पूरी व्यवस्था बदल दी है। आज कई युवतियां स्वास्थ्य के साथ-साथ अपनी शारीरिक बनावट और सुविधा को भी प्राथमिकता देने लगी हैं।

इसी कारण सिजेरियन डिलीवरी का चलन तेजी से बढ़ रहा है। हालांकि विशेषज्ञ इसे पूरी तरह गलत नहीं मानते।

विशेषज्ञों की राय : आधुनिक तकनीक से घटी मातृ-शिशु मृत्यु दर

इस विषय पर जब एक चिकित्सा विशेषज्ञ से बात की गई तो उन्होंने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति ने मातृ और शिशु मृत्यु दर को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा कि आज अस्पतालों में बेहतर सफाई, आधुनिक मशीनें, प्रशिक्षित डॉक्टर और प्रसव के बाद मां और बच्चे की विशेष निगरानी की सुविधा उपलब्ध है।

विशेषज्ञों के अनुसार कई मामलों में सिजेरियन प्रसव मां और बच्चे दोनों की जान बचाने के लिए जरूरी होता है। साथ ही प्रसवोत्तर जांच से महिलाओं में कुपोषण, कमजोरी और अन्य बीमारियों की पहचान भी समय रहते हो जाती है।

हालांकि उन्होंने यह भी माना कि आधुनिक चिकित्सा व्यवस्था में बढ़ती महंगाई आम परिवारों के लिए बड़ी चुनौती बन चुकी है।

मातृ दिवस पर सोचने की जरूरत

मातृ दिवस के अवसर पर यह सवाल एक बार फिर उठ रहा है कि क्या आधुनिक चिकित्सा सुविधा और व्यवसायिकता के बीच मातृत्व का स्वाभाविक स्वरूप कहीं पीछे छूटता जा रहा है?

विशेषज्ञों का मानना है कि जरूरत इस बात की है कि लोगों को सही जानकारी मिले, अनावश्यक डर न फैलाया जाए और प्रसव को केवल कमाई का जरिया न बनाया जाए।

मां और बच्चे की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ ही चिकित्सा व्यवस्था में पारदर्शिता और संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है।

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