“ब्लड मैन ऑफ बिहार” मुकेश हिसारिया : इंसानियत, सेवा और समर्पण की जीवंत मिसाल एक ऐसा नाम जिसने सेवा को बना लिया जीवन का मिशन
पटना।
आज के दौर में जहां लोग अपने निजी जीवन और व्यस्तताओं में उलझे रहते हैं, वहीं बिहार में एक ऐसा नाम है जिसने अपनी पूरी जिंदगी मानव सेवा के लिए समर्पित कर दी। यह नाम है Mukesh Hissariya।
मुकेश हिसारिया आज बिहार ही नहीं, बल्कि देशभर में “ब्लड मैन ऑफ बिहार” के नाम से पहचाने जाते हैं। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि यदि किसी इंसान के भीतर सेवा का भाव हो, तो वह हजारों लोगों की जिंदगी बदल सकता है।
रक्तदान अभियान से लेकर गरीबों की सहायता, कोविड महामारी के दौरान अंतिम संस्कार सेवा, जरूरतमंद मरीजों की मदद, थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को रक्त उपलब्ध कराना और समाज के कमजोर वर्गों के लिए लगातार काम करना — इन सभी क्षेत्रों में मुकेश हिसारिया ने अपनी अलग पहचान बनाई है।

मां की बीमारी ने बदल दी सोच, शुरू हुआ सेवा का सफर
मुकेश हिसारिया के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ उस समय आया जब उनकी माता गंभीर रूप से बीमार हुईं। इलाज के लिए उन्हें दक्षिण भारत के वेल्लोर स्थित अस्पताल ले जाया गया।
वहीं उन्होंने पहली बार बहुत करीब से लोगों का दर्द देखा। अस्पताल में कई ऐसे परिवार थे जो अपने मरीज के लिए खून की व्यवस्था नहीं कर पा रहे थे। कई लोग घंटों अस्पताल के बाहर रक्तदाताओं की तलाश में भटकते दिखाई देते थे।
यह दृश्य मुकेश हिसारिया के मन को अंदर तक झकझोर गया। उन्होंने महसूस किया कि रक्त की कमी के कारण किसी की जिंदगी खतरे में पड़ सकती है। उसी समय उन्होंने मन में संकल्प लिया कि वे जरूरतमंद मरीजों की मदद करेंगे और रक्तदान को एक बड़ा जनआंदोलन बनाएंगे।
यही वह क्षण था जिसने एक सामान्य व्यक्ति को समाजसेवा के रास्ते पर आगे बढ़ा दिया।

“रक्तदान महादान” अभियान बना पहचान
वेल्लोर से लौटने के बाद मुकेश हिसारिया ने बिहार में रक्तदान जागरूकता अभियान शुरू किया। उस समय लोगों में रक्तदान को लेकर कई तरह की भ्रांतियां थीं। लोग डरते थे कि रक्तदान करने से कमजोरी आ जाएगी या स्वास्थ्य खराब हो जाएगा।
लेकिन मुकेश हिसारिया ने गांव-गांव, शहर-शहर जाकर लोगों को समझाया कि रक्तदान किसी की जिंदगी बचाने का सबसे बड़ा माध्यम है।
उन्होंने युवाओं को जोड़ा, कैंप आयोजित किए और एक ऐसा नेटवर्क तैयार किया जो जरूरत पड़ने पर तुरंत रक्त उपलब्ध करा सके।
धीरे-धीरे उनकी पहल ने बड़ा रूप लेना शुरू किया।
आज स्थिति यह है कि बिहार के कई अस्पतालों में यदि किसी मरीज को अचानक रक्त की आवश्यकता होती है, तो लोग सबसे पहले मुकेश हिसारिया और उनकी टीम से संपर्क करते हैं।

थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों के लिए बने सहारा
थैलेसीमिया एक ऐसी गंभीर बीमारी है जिसमें बच्चों को नियमित रूप से रक्त चढ़ाने की जरूरत होती है। कई गरीब परिवारों के लिए हर बार रक्त की व्यवस्था करना बेहद मुश्किल होता है।
मुकेश हिसारिया ने ऐसे बच्चों के लिए विशेष अभियान चलाया। उन्होंने रक्तदाताओं का नेटवर्क तैयार किया ताकि किसी भी बच्चे को रक्त की कमी का सामना न करना पड़े।
कई परिवार बताते हैं कि उनके बच्चों की जिंदगी आज इसलिए सुरक्षित है क्योंकि समय पर रक्त उपलब्ध हो सका।
यही कारण है कि हजारों परिवार उन्हें भगवान का दूसरा रूप मानते हैं।

कोविड महामारी में निभाई सबसे बड़ी मानव सेवा
कोरोना महामारी का समय पूरी दुनिया के लिए भय और संकट का दौर था। अस्पतालों में मरीजों की लंबी कतारें थीं। लोग अपने ही परिजनों के पास जाने से डर रहे थे।
ऐसे समय में मुकेश हिसारिया ने जो किया, उसने उन्हें समाज में एक अलग पहचान दिलाई।
जब कई कोविड मरीजों के शवों को अंतिम संस्कार के लिए कोई आगे नहीं आ रहा था, तब उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना अंतिम संस्कार सेवा शुरू की।
उन्होंने पीपीई किट पहनकर कई कोविड मृतकों का अंतिम संस्कार कराया। कई ऐसे शव भी थे जिनके परिवार वाले मौजूद नहीं थे।
मुकेश हिसारिया और उनकी टीम ने:
- कोविड मरीजों को रक्त उपलब्ध कराया
- ऑक्सीजन सिलेंडर पहुंचाए
- दवाइयों की व्यवस्था की
- गरीब परिवारों तक राशन पहुंचाया
- अस्पतालों में सहायता पहुंचाई
- अंतिम संस्कार सेवा दी
उनकी यह सेवा देखकर पूरा बिहार भावुक हो गया। कई लोगों ने कहा कि महामारी के अंधेरे समय में मुकेश हिसारिया उम्मीद की रोशनी बनकर सामने आए।
गरीब बेटियों के विवाह में भी करते हैं मदद
मुकेश हिसारिया सामाजिक कार्यों में केवल स्वास्थ्य सेवा तक सीमित नहीं हैं। वे गरीब परिवारों की बेटियों के विवाह में भी मदद करते हैं।
सामूहिक विवाह कार्यक्रमों में आर्थिक सहयोग देना, जरूरतमंद परिवारों की सहायता करना और बेटियों की शादी में मदद करना उनके प्रमुख सामाजिक कार्यों में शामिल है।
उनका मानना है कि समाज का हर सक्षम व्यक्ति यदि जरूरतमंदों की थोड़ी मदद करे, तो कई परिवारों की जिंदगी बदल सकती है।

युवाओं के लिए बन चुके हैं प्रेरणा
आज बिहार के हजारों युवा मुकेश हिसारिया के कार्यों से प्रेरित होकर रक्तदान और समाजसेवा से जुड़ रहे हैं।
उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे सेवा कार्यों को कभी प्रचार का माध्यम नहीं बनाते। वे हमेशा कहते हैं:
“मानव सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता।”
उनके नेतृत्व में कई युवा समूह अब नियमित रूप से रक्तदान शिविर आयोजित करते हैं।
कई संस्थाओं ने किया सम्मानित
समाज सेवा और मानवता के क्षेत्र में योगदान के लिए मुकेश हिसारिया को कई सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
उन्हें विभिन्न मंचों पर आमंत्रित किया जाता है, जहां वे युवाओं को समाज के लिए काम करने की प्रेरणा देते हैं।
उनकी पहचान अब केवल एक समाजसेवी के रूप में नहीं, बल्कि बिहार में इंसानियत और सेवा की मिसाल के रूप में बन चुकी है।
“ब्लड मैन ऑफ बिहार” अब एक आंदोलन का नाम
आज मुकेश हिसारिया केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक सोच, एक मिशन और एक आंदोलन का नाम बन चुके हैं।
उनका जीवन यह संदेश देता है कि:
- रक्तदान जीवनदान है
- सेवा सबसे बड़ा धर्म है
- इंसानियत ही असली पहचान है
बिहार के लाखों लोग आज उनके कार्यों को सम्मान की नजर से देखते हैं। जरूरतमंदों के लिए वे उम्मीद की किरण बन चुके हैं।
मुकेश हिसारिया की कहानी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है कि यदि इरादे नेक हों, तो एक इंसान भी पूरे समाज में बदलाव ला सकता है।







