​प्राचीनतम मंदिरों में शुमार मां मुंडेश्वरी मंदिर में उमड़ा भक्तों का जनसैलाब, सुविधाओं के अभाव से हलकान हैं श्रद्धालु।

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कैमूर/मुकुल जायसवाल
 कैमूर जिला स्थित देश की प्राचीनतम मंदिर मां मुंडेश्वरी धाम में भक्तों का सैलाब उमडऩे लगा है। यह मंदिर पवरा पहाड़ी पर अष्टकोणीय रूप में स्थित है । बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण नही कराया गया है बल्कि  खुदाई में यह मंदिर मिला है। यहां मिले शिलालेखों से पता चलता है कि 526 ईसा पूर्व में मंदिर पाया गया है। इस मंदिर में भगवान शिव का चतुर्मुखी रूप है और कहा जाता है कि मां पार्वती का रूप ही माँ मुंडेश्वरी की है। जिस कारण सावन के महीने में भी भगवान शंकर का जलाभिषेक करने और माँ मुंडेश्वरी का आशीर्वाद पाने के लिए भक्तों का तांता लगा रहता है। यहां जिस तरह की भीड़ होती है ,उसके लिए सुरक्षा व्यवस्था का कोई इंतजाम नही किया गया है। जिसके कारण मंदिर के ऊपर जाने वाली दुर्गम रास्ते में वाहनों के परिचालन से जाम लग जाता है और भक्त परेशान हो जाते हैं।सावन में मां मुंडेश्वरी धाम के गर्भ गिरी में अवस्थित चतुर्थ मुखी भगवान शिव लिंग के जलाभिषेक के लिए जन सैलाब उमड़ पड़ा है।  साथ में मां मुंडेश्वरी के दर्शन हेतु विभिन्न राज्यों से आए श्रद्धालुओं को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली से आए  दर्शनार्थियों का कहना है कि मां मुंडेश्वरी की असीम कृपा है कि जो लोग भी मनोकामना लेकर यहां आते हैं ,मां का दर्शन करने से उनकी मनोकामना पूर्ण होती है। महिला श्रद्धालुओं का कहना है कि मां की असीम कृपा है,  हम लोगों ने मन्नत मांगी थी, मनोकामना पूर्ण होने पर दर्शन करने आएंगे। मनोकामना पूर्ण होने पर पुनः दर्शन करने आएंगे। इधर पर्यटन अतिथि गिरी के नाइट गार्ड अजीमुद्दीन का कहना है कि प्रशासनिक पदाधिकारी समय से नहीं आते हैं। जिसके कारण अवैध रूप से गाड़ियां मां के मंदिर के पास जाने लगती है। नतीजतन जाम की समस्या बनी रहती है और यात्री परेशान रहते हैं । अभी दिन के ग्यारह बज गये हैं। लेकिन सुरक्षा व्यवस्था को लेकर कोई पुलिस पदाधिकारी उपलब्ध नहीं हैं। प्रधान पुजारी उमेश मिश्र का कहना है कि देश-विदेश और कई राज्यों से श्रद्धालु आते हैं,  जिनकी मनोकामना पूर्ण होती है। मां के यहां एक अनूठी परम्परा है । यहां पशुओं को मां की प्रतिमा के समक्ष लाया जाता है। मंदिर के पुजारी द्वारा मंत्रोच्चार के बाद पशु पर अच्छ्त फूल मारा जाता है, वो मूर्छित हो जाता है और पुनः मंत्रोच्चारण के बाद अच्छत फूल पशु पर मारने के बाद बकरा खड़ा हो जाता है । यह बली की प्रक्रिया विश्व की अनूठी परम्परा  है। ऐसे में रक्त विहीन पशु बलि पूर्ण होता है।