लोकनायक के सपनों की बस्ती : सोखोदेवरा

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किसी समाज में परंपरा,विश्वास और संस्कारों का सतत प्रवाह इतिहास के गलियारों से होकर वर्तमान दहलीज तक होता है। इतिहास के पन्नों पर पड़ी धूल की परतें उन बेशकीमती स्मृतियों पर पर्दा डाल देती हैं, जो अतीत का झरोखा होती हैं। उन्हें सहेजकर रखने की प्रवृति अतीत में झांकने का न सिर्फ सुनहरा मौका देती है, बल्कि सामाजिक मापदंडों को भी बरकरार रखती है। सोखोदेवरा इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण यहाँ स्मृतियों में नहीं, बल्कि पूरे परिवेश में विद्यमान हैं।

बिहार की राजधानी पटना से होकर गुजरनेवाली एनएच-30 अपनी खूबसूरती पर इतराती नजर आती है। फोरलेन में तब्दील हो जाने के बाद अब यह मल्टीप्लेक्स की तरह चमकने लगी है। टोल प्लाजा पर नई-नवेली दुल्हन की तरह सजी हाईवे की मुंह दिखाई देने के बाद गाडि़यां जैसे हवा से बात करने लगती है। लेकिन थोड़ी ही देर की सफर के बाद पीछे की ओर भागते पेड़-पौधे,नदी, तालाब, गाँव और कस्बों की भूल-भूलैया से फोरलेन के रोमांचक एहसास की परत धुंधली होने लगती है। कभी भारत को एक सूत्र में पिरो देनेवाले सम्राट अशोक के सत्ता-केन्द्र यानि पटना से चलकर शिक्षा के प्राचीन विश्व केन्द्र और भगवान बुद्ध एवं महावीर की कर्मभूमि यानि नालंदा को पारकर सड़क वहां तक ले आती है, जहाँ दुर्लभ स्मृतियों का सुंदर संसार बसा है। यह गाँव है नवादा जिले के कौआकोल प्रखंड का सोखोदेवरा। पटना से इस गाँव की दूरी तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर है।लेकिन जेपी के आभामंडल की ऊर्जा वहाँ सत्ता के गलियारे तक पहुंचती है. आज भी इस गाँव के जन-जन और कण-कण में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों के प्रतिबिंब को आसानी से महसूस किया जा सकता है। बिहार के इस सुदूरवर्ती गाँव में उनके यादों के अवशेष और विचारधारा की खुशबू स्वराज,स्वच्छ लोकतंत्र और सर्वांगीण विकास के भावना की मानसिक यात्रा कराती है।

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घनी झाडि़यों से आच्छादित ऊँचे पहाड़ की तलहटी में बसे सोखोदेवरा के सर्वोदय आश्रम की चिर शांति हस्तकरघा और चरखे की आवाज से भंग होती है। 1954 में जयप्रकाश नारायण ने इस आश्रम की स्थापना की। दरअसल आजादी के पहले ही जेपी ने इस गाँव को खुद में आत्मसात कर लिया था। बात उन दिनों की है जब १९४२ में महात्मा गांधी के आह्वान पर भारत छोड़ों आंदोलन के रूप में गुलामी की बेडि़यां तोड़ने की अंतिम लड़ाई लड़ी जा रही थी। अंग्रेजी सरकार के लिए खतरा मानकर जयप्रकाश नारायण को हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया था। लेकिन जेल की दिवारों ने उनके बुलंद हौसलों के आगे घुटने टेक दिए। मातृभूमि की आवाज सुनकर जेपी जेल से फरार हो गए। अंग्रेजी हुकूमत उनका पीछा करती रही और वे उनकी नजरों से बचते-बचाते सोखोदेवरा की पहाडि़यों पर आकर छिप गए। कई दिनों तक जेपी इन पहाडि़यों पर फल-फूल खाकर अपना गुजारा करते रहे। पहाडि़यों से उतरकर जब वे गाँव में आए तो इलाके की समस्याएं देखकर दंग रह गए। स्थिति इतनी गंभीर थी कि पूरे कौआकोल इलाके को कालापानी के नाम से जाना जाता था। बिना देरी किये जेपी इलाके की समस्याएं दूर करने में जुट गए। आर्थिक आजादी के लिए वे घुम-घुमकर लोगों से सूत कातने की अपील करने लगे। कुछ ही दिनों में वे इलाके में काफी लोकप्रिय हो गए.उनके किये गए प्रयासों से प्रभावित होकर कई लोगों ने अपनी जमीनें दान में दी। जिनपर बाद में सर्वोदय आश्रम की नींव रखी गई। जिन पहाडि़यों पर जेपी छुपकर रहा करते थे। आज उन्हें जेपी चट्टान के रूप में जाना जाता है।

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अपने जीवनकाल में जयप्रकाश नारायण ने अमेरिका, रूस, जापान और इंग्लैंड सहित कई देशों की यात्रा की। लेकिन सोखोदेवरा से उनका लगाव ज्यों-का-त्यों बरकरार रहा। खासकर सर्वोदय आश्रम जैसे उनके जीवन का अहम् हिस्सा बन गया था। यहाँ बैठकर वे संत विनोबा भावे के साथ देश के कई नामी गिरामी नेताओं के साथ रणनीतियां तय किया करते थे। सर्वोदय आश्रम में आज भी जयप्रकाश नारायण की व्यक्त्वि की आभामंडल को आसानी से महसूस किया जा सकता है। आश्रम के एकांत कोने में बना जेपी निवास उनकी सादगी को जीवंतता प्रदान करता है। जिस लालटेन की रौशनी में बैठकर जयप्रकाश नारायण समाज में उजाला फैलाते थे। वह आज भी उनकी स्मृतियों को ताजगी देने के लिए आश्रम में मौजूद है। उनकी टोपी, छड़ी, बर्तन और बिस्तर आश्रम में उनकी मौजूदगी का अहसास कराते हैं। उनके बिस्तर के नीचे पड़े खड़ाउ को देखकर प्रतीत होता है कि जेपी जैसे सुबह की सैर पर निकले हो। दो कमरे के संकीर्ण स्थान में रहनेवाले जेपी की सोच कितनी व्यापक थी। इससे आज हर कोई बखूबी वाकिफ है। उनके दो कमरों के निवास से सटे फूस की कुटिया बनाई गई है। जहाँ आम से लेकर खास तक जयप्रकाश नारायण के साथ मंत्रणा किया करते थे। आज भी अपने मूलरूप में मौजूद इस कुटिया में जेपी की यादें बसी है। कुटिया के इर्द-गिर्द आज भी उन राजनीतिक चर्चाओं की गूंज सुनाई देती है। जिन्होंने देश की राजनीति में नये आयाम स्थापित किए।

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जयप्रकाश नारायण की स्मृतियों के तीर्थस्थल के रूप में आज सोखोदेवरा की पहचान  है। आजादी के बाद देश में व्याप्त राजनीतिक कुरीतियों के खिलाफ जयप्रकाश नारायण ने १९७४ में संपूर्ण क्रांति का बिगुल फूंक दिया।उस क्रांति की मशाल को आज भी लोगों ने वहां बुझने नहीं दिया है। संपूर्ण क्रांति में शामिल सप्त क्रांतियों पर आधारित कार्यकलाप  सोखादेवरा की दिनचर्या में शामिल है। यहाँ करघे पर सूत से कपड़े की बुनाई करता बुनकर और चरखा चलाती महिलाएं देश की आजादी के लक्ष्य को आइना दिखाती है। हालाँकि आधुनिक लोकतंत्र की रौशनी आज भी यहाँ पूरी तरह नहीं पहुंची है। लेकिन जेपी के विचारधारा की बदौलत इलाके में लोगों को भूखे पेट सोने की नौबत नहीं आती। बाइस सौ महिलाएं केवल सूत की कताई से परिवार का भरण-पोषण करती हैं। कई परिवार बकरीपालन,मुर्गीपालन और ग्रामोद्योग से जुड़े हैं। पूरे सोखोदेवरा की अर्थव्यवस्था और सामाजिक गतिविधि लोकनायक के व्यक्त्वि और कृतित्व को समर्पित हैं।

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लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने 1979 में अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद राजनीतिक गलियारे में उनके अनुयायियों के बीच सत्ता पाने के लिए शह-मात का खेल चलता रहता है। लेकिन सोखोदेवरा ने उनके विचारधारा की विरासत को जिंदा रखा है। देश की राजनीति में आमूलचूक परिवर्तन लानेवाले जेपी अपने जीवनकाल में ही राजनीति की नई पौध से निराश होने लगे थे। यहाँ आने के बाद प्रतीत होता है कि निराश होकर लोकनायक सोखोदेवरा में ही समाधि में अंतर्लीन हो गए है। लेकिन आश्रम की हर दरख्त,हर दिवार, हर निर्जीव और सजीव का मनोभाव बताता है कि आज भी वे निराश नहीं है। बल्कि नये विचारों के आविर्भाव के लिए वे चिरनिद्रा में चिंतन कर रहे हैं। सर्वोदय आश्रम में पहाड़ों के ठीक विपरीत दिशा में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संगमरमर की मूर्ति लगायी गई है. आज भी उनकी यह मूर्ति भ्रष्टाचारमुक्त देश,अपराधमुक्त राजनीति, समानतामूलक समाज और हर हाथ को रोजगार का संदेश देती है। कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा की यादों के  इस नगर में जेपी और उनके विचार दोनों जिन्दा है.

राजगीर कुमार सिंह