बक्सर में शुरू हुआ आज से प्रसिद्ध पंचकोशी परिक्रमा। साधु संतों और श्रद्धालुओं का लगा जमावड़ा,सुरक्षा के किये गए पुख्ता इंतजाम।

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बक्सर  – बक्सर के ऐतिहासिक पंचकोशी मेले की शुरुआत आज से हो गयी। पंचकोशी के पहले पड़ाव में बक्सर के अहिरौली से मेले की शुरुआत हुयी। इस मौके पर दूर दराज से हजारो श्रद्धालु अहिरौली पहुंचे और माता अहिल्या के मंदिर में पूजा अर्चना की। इस दिन अहिरौली पहुंचे महिला श्रद्धालु माता अहिल्या के मंदिर में दीप जलाती है और सुख समृद्धि की कामना करती है। अहिरौली में स्थित माता अहिल्या का मंदिर काफी प्राचीन है और यही गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या को भगवान श्रीराम के चरण स्पर्श से मुक्ति मिली थी। लिहाजा यंहा पहुचने वाले भक्त माता अहिल्या के मंदिर में पूजा पाठ करते है। ऐसी मान्यता है की जब भगवन श्री राम बक्सर पहुंचे थे तब पांच जगहों पर गए थे और उन्होंने तरह तरह के पकवान और स्वादिस्ट भोजन किया था। लिहाजा प्रसाद के रूप में पहले दिन और पहले पड़ाव अहिरौली में पुआ बनता है और लोग उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण करते है। 8 नवंबर से शुरू होकर 12 नवंबर तक चलनेवालों पंचकोशी मेले के आखिरी दिन लिट्टी चोखा बनाया जाता है और उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। इस दिन देश भर से बक्सर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटती है। इस दौरान सुरक्षा के पुख्ता व्यवस्था किये गए हैं।
क्या है माता अहिल्या की कहानी ?
रामायण में वर्णित कथा के अनुसार राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन आदि देखने के लिये निकले तो उन्होंने एक उपवन में एक निर्जन स्थान देखा। राम बोले, “भगवन! यह स्थान देखने में तो आश्रम जैसा दिखाई देता है किन्तु क्या कारण है कि यहाँ कोई ऋषि या मुनि दिखाई नहीं देते?” विश्वामित्र जी ने बताया, यह स्थान कभी महर्षि गौतम का आश्रम था। वे अपनी पत्नी के साथ यहाँ रह कर तपस्या करते थे। माता अहिल्या इतनी सुंदर थी कि उनके रूप की चर्चा तीनों लोक में थी। जब यह बात देवराज इंद्र को पता चली तो वो उनके प्रति आकर्षित हो गए। एक दिन जब गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गये हुये थे तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम ऋषि के वेश में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की लेकिन जब गौतम ऋर्षि अपनी कुटिया में लौटे तो, अपने ही स्वरूप को देखकर चौंक गए। गौतम ऋषि की दृष्टि इन्द्र पर पड़ी जो उन्हीं का वेश धारण किये हुये था। वे सब कुछ समझ गये और उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को शाप दिया कि दुराचारिणी! तू हजारों वर्षों तक केवल हवा पीकर कष्ट उठाती हुई यहाँ राख में पाषाण बनी पड़ी रहे। जब राम इस वन में प्रवेश करेंगे तभी उनकी कृपा से तेरा उद्धार होगा। तभी तू अपना पूर्व शरीर धारण करके मेरे पास आ सकेगी। यह कह कर गौतम ऋषि इस आश्रम को छोड़कर हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगे। इसलिये विश्वामित्र जी ने कहा “हे राम! अब तुम आश्रम के अन्दर जाकर अहिल्या का उद्धार करो।” विश्वामित्र जी की बात सुनकर वे दोनों भाई आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुये। वहां तपस्या में निरत अहिल्या कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, केवल उसका तेज सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो रहा था। जब अहिल्या की दृष्टि राम पर पड़ी तो उनके पवित्र दर्शन पाकर एक बार फिर सुन्दर नारी के रूप में दिखाई देने लगी और जैसे ही श्रीराम ने अहिल्या के पाषाण रूप को छुआ अहिल्या शाप मुक्त हो गई।