माँ की एक सीख ने बदल दी मनोज तिवारी की जिंदगी !

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2009 की बात है. पटना के मोइनुल हक़ स्टेडियम में टी 20 मैच का आयोजन किया गया था. समाचार संकलन के लिए मैं भी स्टेडियम में ही मौजूद था. विनोद कांबली, गौतम गंभीर और वीरेंदर सहवाग जैसे दिग्गज खिलाडी इस मैच में हिस्सा  ले रहे थे. मैच समाप्त होनेवाला था. तभी स्टेडियम के उत्तरी छोर से कुछ लोग कूदकर बीच स्टेडियम में आ गए. उन्हें रोकने की कोई भी कोशिश की जाती. इससे पहले ही सैकड़ों लोगों की भीड़ खिलाडियों को देखने के लिए क्रिच की ओर दौड़ पड़ी. खिलाडियों की भीड़ आगे आगे और लोगो का हुजूम उनके पीछे पीछे. विनोद काम्बली उस वक्त बीच मैदान में ही थे. किसी तरह भीड़ से बचकर वह पवेलियन तक पहुँच सके थे. बाद में पता चला की डर के मारे मौर्या होटल आते आते काम्बली की तबियत ख़राब हो गई थी. पुरस्कार वितरण के लिए उस समय के राज्यपाल आर० एल० भाटिया भी स्टेडियम में ही मौजूद थे. इसके बावजूद भीड़ बेकाबू थी. पूरा मैदान लोगो से भर चूका था. कहा जाता है की उस समय इस मैच का आयोजन पटना में कराने में कीर्ति आज़ाद और मनोज तिवारी की अहम् भूमिका थी. अंततः मनोज तिवारी ही माइक लेकर क्रिच पर आये. भीड़ के बीच जाकर उन्होंने लोगों से बिहार की इज्जत का हवाला दिया. फिर भी भीड़ पर उसका कोई असर नहीं हो रहा था. अंत में क्रिच पर से ही उन्होंने एक देशभक्ति गीत गाना शुरू किया. मनोज तिवारी जैसे जैसे आगे बढ़ते गए. भीड़ पीछे मुड़ने लगी. गाने के ख़त्म होते होते भीड़ पूरी तरह शांत हो गई.

मनोज तिवारी की यही प्रतिभा अन्ना हजारे आंदोलन के दौरान दिल्ली के रामलीला मैदान में भी देखने को मिली थी. जब उनके गाये देशभक्ति गानों पर आन्दोलन में शामिल युवाओं में नया जोश भर जाता था. मनोज तिवारी की इसी कला ने 2014 में पीएम् पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी का ध्यान आकर्षित किया. उन्हें नार्थ ईस्ट दिल्ली से भाजपा का उम्मीदवार बनाया गया और अब मनोज तिवारी वहां से लोकसभा के सदस्य है. दिल्ली नगर निगम चुनाव में उनके नेतृत्व क्षमता को देखकर दिल्ली भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष भी कार्यभार भी मनोज तिवारी को ही सौप दिया गया. इस तरह कला और राजनीति के समावेश का मनोज तिवारी से कोई बेहतरीन उदाहरण नहीं है.

यह मनोज तिवारी के व्यक्तित्व का सिर्फ एक पहलू है. वे अच्छे गायक, अभिनेता, टीवी उद्घोषक, संगीतकार और क्रीकेटर हैं. गायकी के रास्ते मनोज तिवारी जब फिल्मों में आये तो यहाँ भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का परचम फहरा दिया. उनकी फिल्म “ससुरा बड़ा पईसावाला” ने बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दिया. आंकड़े बताते है की इस फिल्म ने अपनी लागत से पांच गुनी अधिक कमाई की थी. बेजान पड़ी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में इस फिल्म ने नई ऊर्जा भर दी. इसके बाद मनोज तिवारी अभिनीत “दरोगा बाबु आई लव यू” और “वन्धन टूटे ना” जैसी फिल्मों ने  भी दर्शको को सिनेमा हॉल तक आने के लिए मजबूर कर दिया. ईटीवी पर प्रसारित धुन, महुआ चैनल पर प्रसारित होनेवाले सुर संग्राम जैसे कार्यक्रम से उनकी पैठ घर घर तक हो चुकी थी. रही सही कसर बिग बॉस ने पूरी कर दी. धीरे धीरे मनोज तिवारी शोहरत की बुलंदियों तक पहुँच गए.

लेकिन गायकी से अभिनय और अभिनय से राजनीति की सफ़र तय करनेवाले मनोज तिवारी की राह इतनी आसान नहीं थी. उसमें केवल कांटे ही कांटे थे. बिहार के कैमूर जिले के एक छोटे से गाँव अतरवलिया में उनका जन्म हुआ था. पिता चंद्रदेव तिवारी बनारस घराने के क्लासिकल सिंगर थे. लेकिन पिता से संगीत की कोई शिक्षा मिलती. उससे पहले ही सिर से पिता का साया उठ गया. तब उनकी उम्र मात्र 12 साल थी. लेकिन संगीत उन्हें विरासत में मिली थी. उम्र बढ़ने के साथ उनके संगीत में भी निखार आने लगा. संगीत की दुनिया में पाँव ज़माने के लिए मनोज तिवारी पुरजोर जोर आजमाइश करने लगे. तब तक उनके एक दो अल्बम भी मार्केट में आ चुके थे. लेकिन संगीत की दुनिया में स्थापित होने के लिए उस समय एक ही माध्यम था. वह था गुलशन कुमार की कंपनी टी- सीरिज का हाथ. मौके की तलाश में मनोज तिवारी हमेशा अपने रिकार्ड किये गाने लेकर कंपनी में जाने लगे. लेकिन कई बार उन्हें वहां से वापस कर दिया गया. मनोज तिवारी खुद बताते है की टी-सीरिज वालों को विश्वास ही होता था की पेंट शर्ट पहननेवाला व्यक्ति भोजपुरी और अवधि भी गा सकता है. लगभग चार साल तक दौड़ लगाने के बाद भी कंपनी ने उन्हें कोई भाव नहीं दिया. मनोज तिवारी की अब हताशा बढ़ने लगी थी. अपनी कैरियर को लेकर वे निराश होने लगे थे. मदद के लिए कोई सामने नहीं आ रहा था. पिता का साया पहले ही सिर से उठ चूका था. लेकिन माँ की आँखों से भला बेटे का दर्द कैसे छिप सकता था.

माँ ललिता देवी ने फ़ौरन ही बेटे की असफलता की पीड़ा को महसूस कर लिया. माँ के बार बार पूछने पर मनोज तिवारी ने अपनी माँ को बताया की वे फिल्मों और अल्बम के लिए गाते है. लेकिन सफलता उनसे कोसों दूर है. कोई राह भी नजर नहीं आ रहा है. टी- सीरिज में संघर्ष की कहानी भी उन्होंने माँ से बयां कर दी. मन को हल्का करने के लिए उन्होंने माँ को ये सब बाते बताई थी. उन्हें पता था माँ कर भी क्या सकती है. सही भी था. गाँव में रहनेवाली महिला, जो पढ़ी लिखी नहीं थी. जिन्हें कोई जानता भी नहीं था. संगीत से उनका कोई लेना देना नहीं था. फिर वह किस तरह बेटे को उसके दर्द से छुटकारा दिला सकती थी. लेकिन बेटे को उन्होंने अपनी तरफ से जो समझ में आया वह सलाह दी. उनसे कहा की बेटे फिल्मों में तुमको कौन सुनेगा? जो सबकी माँ हैं उनकी शरण में जाओ. अपने बेटे के असफल होने पर दुनिया की हर माँ लगभग यही बोलती है. माँ की बात सुनकर मनोज तिवारी अन्दर से झल्ला गए. माँ से बोले की तुम्हारे कहने का मतलब अब भजन गाये. लगे हाथ यह भी वता दो की कौन सा भजन गाऊ. गाँव की एक अनपढ़ महिला कहा से नया भजन लाये. उन्होंने बेटे को वही देवी भजन सुना दिया जो सभी भोजपुरी भाषी इलाकों में चाव से गायी जाती है. यह भोजपुर और पूर्वांचल का पारंपरिक देवी गीत था.

                               निमिया के डार मैया डाले लू झुलुवावा की झूमी रे झूमी न………………

मनोज तिवारी ने माँ की बात को उस समय गंभीरता से नहीं लिया. उसे लगभग अनसुना कर दिया. लेकिन बाद में सोचा एक बार माँ की भी बात मान लेते है. उस समय उन्हें इस गीत का मतलब भी पता नहीं था. बस उन्होंने इसे दिल से गाकर रिकार्ड कराया और कैसेट लेकर टी- सीरिज के कार्यालय में पहुँच गए. नौ मिनट के इस कैसेट को कंपनी वाले मंत्रमुग्ध होकर सुनते रह गए. इसके बाद मनोज तिवारी “मृदुल” को भला कौन नहीं जानता. लम्बा संघर्ष, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की डिग्री और खून में संगीत की रवानगी. इन सब के बावजूद माँ की केवल एक सीख ने मनोज तिवारी को जो बुलंदी दी. उसकी बदौलत उन्होंने कला और राजनीति के क्षेत्र में आज अपनी अमिट छाप छोड़ी है.

आलेख: राजगीर कुमार सिंह