काश कोई ऐसा रिमोट हो जो हमारे आपके और इस देश के समय को आगे पीछे ले जाये तो मज़ा आ जाये.सबके मन में ये विचार जरुर आता है.लेकिन अफ़सोस कुदरत ने ऐसी कोई युक्ति नहीं बनाई है.हां आज के  संचार माध्यम इस मामले जरुर कुछ सफल हुए है.वे रिमोट के बटन पर आपको समय की मानसिक यात्रा कराते है.खबरिया चैनलों को लीजिये. किसी  को देश का भविष्य तो किसी को वर्तमान बताते हैं.बस,रिमोट का बटन दबाने की जेहमत उठाइये और भारत के सुनहरे भविष्य के सपने में गोते लगाते रहिये.राजनीति का रंग भी तो यही बता रहा है की वो दिन दूर नहीं जब भारत फिर सोने की चिड़िया कहलायेगा.ये टीवी का प्राइम टाइम है.खैर,टेलीविज़न के ठीक विपरीत रेडियो की दुनिया आपको समय के नेपथ्य में ले जाती है.रेडियो मिर्ची पर पुरानी जींस आकांक्षा के साथ.पिया तू अब तो आजा ……………सोलह सावन बहके आके बुझा जा……..तन की ज्वाला ठंडी हो जाये ऐसे गले लगाजा.राजनीति और देश दुनिया की ख़बरों से आपको बाहर लाती है.जहाँ मन हवा में उड़ने लगता है.गाना ख़त्म हुआ की आकांक्षा की अगली पेशकश हम तुम एक कमरे में बंद हो और चाभी खो जाये……………तेरी नज़रों की भूल भुलैया में बॉबी खो जाये.दरभंगा हाउस के गंगा तट पर टहलते टीनएजर प्रेमी जोड़ो की याद दिला देते है.लेकिन ठीक इसके बाद आकांक्षा की अगली पेशकश प्रेम को जवां कर देता है.बाली उमर का प्यार बालिग हो जाता है.गुलाबी आंखे जो तेरी देखी……………शराबी ये दिल हो गया.यहाँ सपनों की दुनिया अलग कुछ इस तरह से सजती है.देखो मैंने देखा है ये एक सपना…………..फूलों के शहर में हो घर अपना.रेडियो मिर्ची की पुरानी जींस हमको आपको चलाकर नहीं,गुलाबी ठण्ड में केवल रजाई में पैर हिलाकर सत्तर और अस्सी के दशक में ले जाते हैं.ये सिनेमा की दुनिया है.जो कई दशक पीछे ले जाता है.लेकिन मिस्टर पर्फ़ेक्टनिस्ट के आमिर खान की धूम थ्री में देश के सिनेमा का भविष्य दिखता है.सब कुछ हाज़िर है टीवी के रिमोट, मोबाइल और लैपटॉप के कीपैड पर.

राजगीर कुमार सिंह
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