दुनिया के हर शहर का एक निश्चित सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दायरा होता है। उसका एक स्थायी संस्कार होता है। जिसपर इतिहास के गलियारे से झांकते किसी व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व और कृतित्व की अमिट छाप होती है। सदियों बाद भी वह शहर उस व्यक्ति विशेष के आभामंडल के सम्मोहन से खुद को अलग नहीं कर पाता। बिहार का सासाराम शहर भी उन्ही में से एक है। जहॉ सैंकड़ों साल गुजर जाने के बाद भी महान अफगान शासक शेरशाह सूरी का वहॉ की फिजां और जनमानस दोनों पर साम्राज्य कायम है।

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बिहार की राजधानी पटना से तकरीबन डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण पश्चिम दिशा में रोहतास का जिला मुख्यालय है सासाराम। सैंकड़ों किलोमीटर का फासला होने के बावजूद दोनों शहरों को अपने समृद्ध इतिहास पर गर्व करने के कई बहाने हैं। प्राचीन पाटलीपुत्र से पूरे भारतीय भूभाग को एक सूत्र में पिरो देनेवाले सम्राट अशोक के हृदय परिवर्तन से आज हर कोई वाकिफ हैं। तो सासाराम के अफगान शासक शेरशाह सूरी ने मुगलों को शिकस्त देकर प्रशासनिक व्यवस्था की जो मिसाल कायम की। उसे भारतीय इतिहास में उच्च कोटि का दर्जा प्राप्त है। भौगोलिक रूप से इन दोनों के बीच भोजपुर जिले का वह क्षेत्र है जिसे बाबू वीर कुंवर सिंह की वीरता पर नाज है। अस्सी साल के उम्र में उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत को सीधी चुनौती देकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की अमरगाथा को सुनहरे अक्षरों में अंकित कर दिया। यानि पटना से लेकर सासाराम तक पूरा इलाका भारत के समृद्ध इतिहास की बानगी प्रस्तुत करता है। बिहार के गौरवशाली इतिहास के पन्ने दर पन्ने पलटते हुये ऑखे सासाराम शहर के मुख्य सड़कों पर लगे उन साइन बोर्ड पर आकर अटक जाती है। जिन पर लिखा होता है-जी टी रोड करहगर मोड़। यह केवल एक इलाके के पते की पहचान मात्र भर नहीं है। इस पर नजर पड़ते ही हर कोई अपनेआप को उस इतिहास से जोड़ लेता है जिसमें महान शासक शेरशाह सूरी के आन, बान और शान की गौरवगाथा दर्ज है। इस शहर की फिजां फरीद खॉ के शेरशाह सूरी बनने की कहानी बयां करती है।

8शेरशाह सूरी के शासनकाल के सदियों बाद विश्व के अन्य शहरों की तरह आज सासाराम भी इक्कीसवीं सदी की तेज बयार में नई अंगड़ाई लेने की कोशिश कर रहा है। नवनिर्मित लंबे-चौड़े और घुमावदार फ्लाईओवर, सिनेमाहॉल, रोशनी से चमचमाते रेस्त्रां, यात्री होटल और उपभोक्तावाद के परिचायक उत्पादों के विज्ञापन से अटे पड़े होर्डिंग। ये सब सासाराम के बदलाव के कोशिश की कहानी को बयां करते हैं। लेकिन शहर के बदलाव की हर कोशिश नाकाफी साबित हो रही है। इसके माकूल कारणों का बहुत आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। इसकी एकमात्र वजह है सासाराम की फिजां में फैली महान अफगान शासक शेरशाह सूरी के आभामंडल की खुशबू। यह शहर आज भी सूरी के सांप्रदायिक सौहार्द्र और उच्च कोटि के शासन-व्यवस्था के मोहपाश से बाहर नहीं निकल पाया है। सूरी के आभामंडल ने जैसे सासाराम को पूरी तरह अपने सम्मोहन में जकड़ रखा है। इस सम्मोहन को तोड़ने की कोई भी युक्ति इस शहर के पास आजतक उपलब्ध नहीं है। समृद्ध इतिहास से लबरेज सासाराम के अतीत के आइने में केवल शेरशाह सूरी की छवि ही मौजूद है। आज भी यहॉ की हर गलियों, चौक-चौराहे, यहॉ तक की आम जनजीवन के मानसपटल पर भी शेरशाह के व्यक्तित्व और कृतित्व की अमिट छाप को महसूस किया जा सकता है। शहर पूरी तरह सूरी के ओज के इर्द-गिर्द रचा बसा है। इसके मद्देनजर सासाराम को सूरी का शहर कहा जाये तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसे सूरी का शहर कहलाने के कई मायने भी हैं। यह शेरशाह सूरी के दिल के करीब था। सूरी के हर सांस में सासाराम था। उन्हें इस शहर से विशेष आसक्ति थी। यह सूरी का गृहनगर था। इस शहर से ही उन्होंने आज की पीढ़ी के सामने भारत के समृद्ध इतिहास का गौरवशाली गाथा प्रस्तुत किया। देश में पहली बार उन्होंने मुद्रा का प्रचलन शुरू किया। संदेशों को एक से दूसरी जगह पहुंचाने के लिये डाक व्यवस्था की शुरूआत की। खासकर ग्रैंड ट्रंक रोड और उनके मकबरे का निर्माण उन्हें कार्यकुषल भारतीय शासकों की लंबी फेहरिस्त से अलग करता है। सासाराम ही नहीं भारत के ऐतिहासिक फलक पर ये दोनों किसी अनमोल रत्न की तरह विराजमान है।

अपनी दूरदर्शी सोच और आम जनता की भलाई के लिये शेरशाह सूरी ने कई जनोपयोगी काम किये। लेकिन ग्रैंड ट्रंक रोड और मकबरा का निर्माण इन दोनों ने शेरशाह सूरी को 5भारत के इतिहास में अमर कर दिया। पहले से मौजूद इस सड़क का सूरी ने पूर्वी भारत के चटगॉव से लेकर अफगानिस्तान के काबूल तक विस्तार किया। सड़क पर राहगीरों के लिये कई तरह की सुविधायें उपलब्ध करायी। तब लोग इसे बादशाही सड़क कहते थे। बाद में इसे ग्रैंड ट्रंक रोड कहा जाने लगा। यह सूरी के शहर और उनके राजधानी को जोड़ती थी। अंग्रेज जब देश में रेल का जाल बिछाने लगे। तब उन्होंने भी सासाराम को नजरअंदाज करना मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने दिल्ली से लेकर हावड़ा के बीच ग्रैंड कॉर्ड लाइन का निर्माण कराया, जो सासाराम को छूकर ही निकलती है। हालांकि दोनों के परिवहन व्यवस्था के पीछे की सोच अलग अलग थी। सूरी आम जनता को सड़क बनाकर सुविधायें उपलब्ध कराना चाहते थे। लेकिन अंग्रेजों ने झारखंड की अकूत खनिज संपदा का अधिक से अधिक मात्रा में दोहन करने के लिये रेल लाइन का निर्माण कराया। शेरशाह के शासनकाल के सदियों बाद जब केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए की सरकार बनी। तब ग्रैंड ट्रंक रोड का फिर से कायाकल्प करने की पहल की गई। वाजपेयी सरकार के निर्णय के तहत पुरानी ग्रैंड ट्रंक रोड को नई चमचमाती फोरलेन सड़क में तब्दील कर दिया गया। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रयासों से आज इस सड़क से होकर गुजरनेवाले छोटे-बड़े वाहन हवा से बात करते नजर आते हैं। लेकिन कई बदलाव के बावजूद जीटी रोड शेरशाह सूरी के स्मृतियों को धुंधली नहीं होने देती है। शेरशाह की परिकल्पना केवल सड़क के निर्माण तक ही सीमित नहीं थी। उन्होंने इस सड़क के इर्द-गिर्द एक शहर का कायाकल्प करने का फैसला किया, जिसे पहले सहसराम और आज की तारीख में सासाराम के रूप में जाना जाता है। आज भी इस शहर के आबोहवा में शेरशाह के आभामंडल की खूबसूरती को आसानी से महसूस किया जा सकता है। सासाराम पर आज भी शेरशाह सूरी के सांप्रदायिक सौहार्द्रता और प्रशासनिक कार्यकुशलता का असर साफ तौर पर देखने को मिलता है।

3शेरशाह सूरी की परिकल्पना केवल जीटी रोड ही सासाराम की पहचान नहीं है। यहॉ पुरानी जीटी रोड के बीचोंबीच बना मजार किसी शहंशाह के बादशाहत पर किसी सूफी संत के दुआओं सा प्रतीत होता है। यहॉ के कुछ ही दूरी पर सड़क किनारे बनाये गये मुख्य द्वार के अंदर प्रवेश करना अतीत के गलियारे में प्रवेश करने के समान हैं। यहॉ से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर शेरशाह सूरी के स्मृतियों का सुंदर संसार बसा है। सासाराम के साथ सूरी के आसक्ति को शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। साफ पानी के कृत्रिम सरोवर में बना भव्य इमारत सूरी और सासाराम के संबंधों की कहानी बखूबी बयां करता है। सासाराम को अपने सांसों में बसा चुके शेरशाह को यहॉ की भूमि में ही सुपूर्द-ए-खाक हो जाने की दिली तमन्ना थी। अपनी इस तमन्ना को अमलीजामा पहनाने के लिये उन्होंने अपने जीवनकाल में ही 1540 में मकबरे का निर्माण कार्य शुरू किया। करीब सैंतीस मीटर उंचे इस मकबरा की खूबसूरती का दीदार करने के लिये आज दुनियाभर के लोग सासाराम आते हैं। अफगान शैली में बने इस मकबरे का डिजाइन उस समय के मशहूर वास्तू-शिल्पी आलिवाल खान ने तैयार किया था। तकरीबन नौ मीटर ऊंचे चबूतरे पर ईटों से बनाकर मकबरा को आंशिक रूप से बलूआ पत्थर से ढंक दिया गया है। चबूतरे के चारों कोनों पर अष्टभुजीय गुम्बदयुक्त मंडपों का निर्माण किया गया है। इसी चबूतरे पर आठ भुजाओंवाला मकबरा बना है। जिसके एक-एक भूजा की लंबाई करीब सतरह मीटर है। ऊंचाई की तुलना की जाए तो आगरा के ताजमहल से भी यह 13 फीट ऊंचा है। इसका निर्माण इस तकनीक से किया गया है कि इसमें हवा और प्रकाष का हमेशा आवागमन बना रहता है। 1882 में अंग्रेजों ने इस मकबरा तक जाने के लिए 332 फीट रास्ते का निर्माण किया। हालांकि अभी मकबरे के निर्माण का कार्य पूरा भी नहीं हुआ था कि कालिंजर में बारूदी विस्फोट में शेरशाह सूरी का असामयिक निधन हो गया। उनके निधन के तीन माह बाद 16 अगस्त 1545 को उनके पुत्र सलीम शाह ने मकबरे का निर्माण कार्य पूरा किया। तब से लेकर आजतक शेरशाह का मकबरा भारत के ऐतिहासिक धरोहरों में महत्वपूर्ण स्थान पर विराजमान है।

काफी कम दिनों यानि मात्र पॉच सालों के शासनकाल में शेरशाह सूरी ने जो कुछ किया। उससे भारत का केवल इतिहास ही नहीं, बल्कि वर्तमान भी प्रभावित है। सूरी के द्वारा मुद्रा और डाक व्यवस्था की षुरूआत आधुनिक समाज के संचालन का अभिन्न अंग है। इसकी प्रासंगिकता आज भी ज्यों की त्यों बरकरार है। ग्रैंड ट्रंक रोड वर्तमान दौर में देष के परिवहन व्यवस्था की जीवन रेखा है। इस तरह सासाराम को केन्द्र में रखकर शेरशाह सूरी ने सदियों पहले आज के आधुनिक भारत की नींव रख दी।

 

 

 

राजगीर कुमार सिंह

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