अतीत की दास्तां बयान करता राजा भोज का ऐतिहासिक किला।

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बक्सर – कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली ये पुरानी कहावत तो आपने जरुर सुनी होगी ,जी हाँ हम बात कर रहे है उसी राजा भोज की जो अब इतिहास के पन्नो में गुम हो चुके है पर उनका अतीत आज भी लोगो के जहन में जिन्दा है। बक्सर जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर दूर नया भोजपुर गाँव में मौजूद आज भी राजा भोज और नवरत्त्न गढ़ के नाम से प्रसिद्ध किला अपने अतीत कि दास्तान बयाँ कर रहा है। खँडहर में तब्दील हो चुके नवरत्त्न गढ़ के किले को देखने के लिए लोग दूर दूर से आते है पर किले कि हालत देख लोगो को मायूशी के शिवा कुछ भी हाथ नहीं लगता। हजारों साल इस पुराने किले में आज भी कई राज दफन है जिसे जानने कि इक्छा अनायास ही लोगो को अपनी ओर आकर्षित करती है।

कुछ दिनों पूर्व भी रहा चर्चा में ऐतिहासिक किला।

बक्सर जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर दूर नया भोजपुर गाँव का नाम का जिक्र इतिहास में भी मिलता है वजह है इस गांव में मौजूद हजारो वर्ष पुराना वो ऐतिहासिक किला जिसे राजा भोज और नवरत्त्न गढ़ का किला के रूप में जाना जाता है। वैसे इस किले को देखने के लिए हर रोज लोगो का हुजूम यहाँ पहुता है। दरअसल नवरत्त्न गढ़ के ऐतिहासिक किला से महज कुछ ही दुरी पर एक सरकारी विद्यालय भवन के निर्माण कार्य के लिए चल रही नीब खुदाई के दौरान जमीन के निचे एक सुरंग मिलने की खबर कुछ दिनों पूर्व बेहद चर्चा में थी। खुदाई के दौरान सुरंग के अंदर नवरत्त्न गढ़ के किला से जुड़े अवशेष मिलने के बाद हर कोई उसे देखने को बेकरार था। खुदाई स्थल पर लगातार बढ़ रही भीड़ को देखते हुए जिला प्रसाशन ने पुरे क्षेत्र को प्रतिबंधित घोषित कर दिया था। खुदाई स्थल के पास पुलिस का सख्त पहरा लगा दिया गया था ताकि असमाजिक तत्व किसी तरह की कोई गड़बड़ी नही कर सके। इस बीच जिला प्रशाशन ने पुरातत्व बिभाग को इस पुरे मामले से अवगत कराया। तत्कालीन जिलाधिकारी रमन कुमार ने बताया था की खुदाई के दौरान ज़मीन के अंदर कमरों और सुरंग के रूप में मिले किला के अवशेष डिटेल के आधार पर पुरातत्व बिभाग द्वारा अपने स्तर पर जल्द ही कार्ययोजना के तहत काम भी शुरू किया जायेगा लेकिन अब तक इस दिशा में कोई पहल नहीं दिखी। ये है बक्सर जिले के नया भोजपुर गाँव में स्थित और खंडहर में तब्दील नवरत्नगढ़ का वो  किला जो आस पास के इलाके में ही नहीं बल्कि इतिहास में भी राजा भोज और नवरत्त्न गढ़ का किला के रूप में बिख्यात है। कभी इस किले में राजा भोज कि सानो सौकत और हाथी घोड़ो कि लम्बी कतारे आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे ,कभी सैकड़ो पहरेदार इस किला की रखवाली और मेजवानी किया करते थे। कभी लोग दूर से ही इस किले को देख ख़ुशी से फुले नही समाते थे। सैकड़ो एकड़ फैला अब यह किला पूरी तरह से खंडहर में तब्दील हो चूका है। प्रसाशनिक उदासीनता के कारण नशेड़ियो और जुआरियो के अड्डे में तब्दील इस किले कि हालत ऐसी हो गयी है कि यहाँ आनेवाले लोग इस किले को दूर से ही देखना पसंद करते है। सरकारी उदासीनता का शिकार यह किला अपनी बदहाली पर आँसू बहा रहा है। इस किले की हालत देख लोगों को अब केवल निराशा और मायुषी के शिवा कुछ नहीं होता।

क्या है किला का इतिहास ?

इतिहास के जानकारों की मानें तो नवरत्न गढ़ का किला का निर्माण मुगलकालीन परमार वंश के राजा रूद्र नारायण मल ने 1631-32 में कराया था। परमार वंश काल में  स्थापित इस किले पर जब मुगलों ने हमला किया तो वे राजा भोज को खोज पाने के बजाय खुद ही इस किले में ग़ुम हो गए। किला इतना बड़ा था कि इस किले को लेकर एक पुरानी  कहावत आज भी मशहूर है कि “बावन गली तिरपन बाजार और दिया जले छप्पन हजार ” बताया जाता है कि इस किले में बावन गली थे जिसमे तिरपन बाजार लगते थे और छप्पन हजार दिए हर रोज जलाये जाते थे ,ये भी कहा जाता है कि यंहा लगनेवाले बाजार में लोग हर तरह का सामान खरीदते थे और जो सामान कोई नहीं खरीदता उसे राजा  भोज खरीद लेते थे ,जानकार लोग यह भी बताते है कि एक दिन एक ब्यक्ति राजा भोज के इस बाजार में दरिद्रता बेचने आया पर उसे किसी ने नहीं ख़रीदा लेकिन राजा भोज ने दारिद्रता को भी खरीद लिया ,तभी से राजा भोज  कि स्थिति दिनों पर दिन ख़राब होती चली गयी। हलाकि इस बात में कितनी सच्चाई है इसका ठोस सबूत शायद ही मौजूद हो। कुछ लोगो की माने तो 16वीं सदी में नया भोजपुर में राजा भोज ने ऐतिहासिक नवरत्त्न गढ़ का किला का निर्माण कराया था। राजा भोज के बाद राजा परवल सिंह उर्फ़ बख्तियार मुहम्द उस किले में रहने लगे। तब से उसे राजाओ का गढ़ मना जाने लगा। राजाओ का दौर गुजरने के बाद यह ऐतिहासिक किला जीर्ण -शीर्ण होकर ढहने लगा।  यह भी कहा जाता है की यहाँ कालीदास और बरुची जैसे नौ विद्वान रत्न के समान थे और उनकी विद्वता कि प्रांत में तूती बोलती थी। गाँववालो कि माने तो अपने सीने में कई ऐतिहासिक राज दफन किये इस किले कि अगर खुदाई कि जाये तो बहुत कुछ निकल सकता है ,कुछ लोगो की माने तो इसी नया भोजपुर गांव के नाम पर भोजपुर जिला का नामकरण हुआ लेकिन नया भोजपुर गाँव आज भी पिछड़ा हुआ है। किले के ध्वस्त होने के बाद से अब तक इसके ज्यादातर हिस्से अतिक्रमण के शिकार हो गए।

सूबे में और भी है कई प्राचीन धरोहर।

बताते चले कि ऐतिहासिक नवरत्त्न गढ़ और राजा भोज का किला तो मात्र एक उदाहरण भर है ,जबकि पुरे सूबे में और भी कई ऐसे ऎतिहासिक धरोहर है जो सरकारी और प्रशासनिक उदासीनता के कारण अपनी बदहाली का द्वंश झेल रहे है ,अगर इन धरोहरो पर ध्यान दिया जाये तो न केवल इन्हें एक पर्यटन स्थल के रूप में बिकसित किया जा सकता है बल्कि निश्चित तौर पर इससे प्रान्त का गौरव भी बढ़ेगा और सरकार को राजस्व भी प्राप्त होगा।